हैदराबाद में नवग्रह जप (नौ ग्रहों की उपासना और शान्ति) पंडित — ऑनलाइन बुक करें
नवग्रह जप नौ ग्रह-देवताओं — सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति (गुरु), शुक्र, शनि, राहु और केतु — की व्यवस्थित वैदिक उपासना है, जो भक्त के जीवन पर इन ग्रहों के प्रभाव को सामंजस्यपूर्ण बनाने के लिए की जाती है।
- अवधि1.5–3 घंटे
- भाषाएँतेलुगु, हिंदी, अंग्रेज़ी
- मूल्य सीमा₹2500–₹15000
- उपलब्धताहैदराबाद में उसी दिन
नवग्रह जप (नौ ग्रहों की उपासना और शान्ति) के बारे में
नवग्रह जप नौ ग्रह-देवताओं — सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति (गुरु), शुक्र, शनि, राहु और केतु — की व्यवस्थित वैदिक उपासना है, जो भक्त के जीवन पर इन ग्रहों के प्रभाव को सामंजस्यपूर्ण बनाने के लिए की जाती है। सनातन धर्म में ग्रह केवल खगोलीय पिण्ड नहीं हैं, बल्कि चेतन कर्म-फल-प्रदाता हैं — जिनके माध्यम से पूर्व-कर्म का फल नियत मुहूर्त पर जीव तक पहुँचता है। इस उपासना का शास्त्रीय आधार महर्षि पराशर का बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, याज्ञवल्क्य स्मृति का ग्रह-शान्ति प्रकरण, मत्स्य पुराण का ग्रह-यज्ञ अध्याय, और स्कन्द पुराण में महर्षि व्यास द्वारा रचित नवग्रह-स्तोत्र है। प्रत्येक ग्रह जीवन के विशिष्ट क्षेत्र का अधिपति है — सूर्य स्वास्थ्य, ओज, आत्म-छवि और राज-कृपा का; चन्द्र मन, माता और भावनाओं का; मंगल साहस, भ्राता और शारीरिक शक्ति का; बुध बुद्धि, वाणी और व्यापार का; गुरु ज्ञान, सन्तान और धर्म का; शुक्र सम्बन्ध, सौन्दर्य, वाहन और कलाओं का; शनि अनुशासन, आयुष्य, कर्म-फल और श्रम का; राहु विदेश, आकस्मिक उत्थान, तकनीक और आसक्ति का; तथा केतु मोक्ष, वैराग्य, गूढ़ विद्या और शल्य-कौशल का। जप-विधि शास्त्रोक्त संख्या में मन्त्र-पाठ, हवन, दान और स्तोत्र-पारायण सहित प्रसिद्ध नवग्रह-क्षेत्रों (सूर्यनार कोयिल, तिरुनल्लार, वैद्येश्वरन कोयिल, कान्जनूर, अलंगुडी आदि) में अथवा गृह-सन्निधि में चावल के आटे से रचित नवग्रह-मण्डल के समक्ष की जाती है।
कब करें
सर्वाधिक प्रभावकारी काल यजमान की जन्म-कुण्डली और वर्तमान ग्रह-गोचर से निर्धारित होते हैं। शास्त्रीय अवसर: (1) किसी भी ग्रह की महादशा या अन्तर्दशा का आरम्भ-समाप्ति — विशेषतः शनि की साढ़े-साती, अष्टम-शनि, राहु-महादशा, गुरु-महादशा; (2) मुख्य गोचर — जन्म-शनि, गुरु-पेयर्ची, राहु-केतु पेयर्ची, सूर्य-ग्रहण और चन्द्र-ग्रहण; (3) मासिक जन्म-नक्षत्र और वार्षिक जन्म-तिथि; (4) ज्योतिषी द्वारा बताया गया ग्रह-दोष — मांगलिक दोष, काल-सर्प दोष, पितृ-दोष, शनि-दोष, गुरु-चाण्डाल योग; (5) किसी भी प्रमुख संकल्प से पूर्व — विवाह, गृह-प्रवेश, व्यवसाय-मुहूर्त, विदेश-यात्रा, शल्य-चिकित्सा, गर्भाधान। प्रत्येक वार पर एक ग्रह का अधिकार है — रविवार सूर्य, सोमवार चन्द्र, मंगलवार मंगल, बुधवार बुध, गुरुवार गुरु, शुक्रवार शुक्र, शनिवार शनि — अतः एकल-ग्रह जप उसी वार पर श्रेष्ठ है, जबकि पूर्ण नवग्रह जप शनिवार, संकष्टी, अमावस्या, पूर्णिमा अथवा संक्रान्ति पर सर्वोत्तम। पुजारी पञ्चाङ्ग से होरा-मुहूर्त चुनकर यह सुनिश्चित करता है कि जप का आरम्भ अधिष्ठाता-ग्रह के अनुकूल लग्न और होरा में हो।
इस पूजा को क्यों करें
उद्देश्य त्रिविध है — दोष-निवारण, कृतज्ञता-निवेदन और साधना-सिद्धि। दोष-निवारण: जब ग्रह नीच राशि में, शत्रु-गृह में, अष्टम या द्वादश भाव में, अथवा राहु-केतु से युक्त होता है, तो उसकी सहज शुभता अशुभ हो जाती है — तुला का सूर्य पिता-कष्ट और सत्ता-संकट देता है, वृश्चिक का चन्द्र मानसिक अस्थिरता, अष्टम-द्वादश का मंगल मांगलिक-दोष और दाम्पत्य-कलह, बुध-राहु बुद्धि-भ्रम, मकर का गुरु धर्म-बाधा, शुक्र-शनि सम्बन्ध-तनाव, शनि की साढ़े-साती कैरियर और स्वास्थ्य पर दबाव, और राहु-केतु अक्ष आकस्मिक उलट-फेर लाता है। जप जीव को पुनः ग्रह-देवता से जोड़ता है, दण्ड को शिक्षा में रूपान्तरित करता है। कृतज्ञता: जब कोई ग्रह-दशा शुभ रूप से बीत जाती है, तब देवता का अनुग्रह बनाए रखने हेतु पूजा। साधना-सिद्धि: प्रत्येक ग्रह अपने अधिकार-क्षेत्र में आशीष देता है — विद्यार्थी बुध का जप करता है, सन्तान-आकांक्षी दम्पति गुरु का, व्यवसायी शुक्र-बुध का, कलाकार शुक्र का, योद्धा मंगल का, मोक्षार्थी केतु का, तकनीकी-विदेश-कारी राहु का। बृहत् पाराशर होरा शास्त्र स्पष्ट कहता है — यदि शास्त्रोक्त जप-संख्या श्रद्धा से, हवन और दान सहित पूर्ण की जाए, तो किसी भी अशुभ ग्रह का प्रभाव अड़तालीस दिनों में शान्त हो जाता है। गूढ़ लाभ है समत्व — यह बोध कि सुख-दुःख दोनों आत्म-शुद्धि के लिए ग्रहों के साधन हैं।
पूजा कैसे होती है
अनुष्ठान आचमन, प्राणायाम और संकल्प से प्रारम्भ होता है, जिसमें यजमान अपना नाम, गोत्र, जन्म-नक्षत्र, वर्तमान दशा-भुक्ति, सम्बन्धित ग्रह-दोष और इच्छित फल घोषित करता है। गणेश-प्रधान-पूजा से विघ्न-निवारण, पुण्याहवाचन से स्थल-शुद्धि, और नौ कलश-स्थापना से देवता का आवाहन होता है। पुजारी स्वच्छ काष्ठ-पट्ट पर अथवा सीधे भूमि पर चावल के आटे और रंगीन चूर्णों से नवग्रह-मण्डल बनाता है: सूर्य मध्य में, शुक्र पूर्व, मंगल दक्षिण, शनि पश्चिम, चन्द्र आग्नेय, राहु नैर्ऋत्य, गुरु उत्तर, बुध ईशान, केतु वायव्य — पाराशर के निर्देशानुसार। प्रत्येक खण्ड में ग्रह का वर्ण-धान्य रखा जाता है: सूर्य के लिए लाल गेहूँ, चन्द्र के लिए श्वेत चावल, मंगल के लिए लाल अरहर, बुध के लिए हरा मूँग, गुरु के लिए चना-दाल, शुक्र के लिए श्वेत चावल, शनि के लिए काले तिल, राहु के लिए उड़द, केतु के लिए कुलथी। प्रत्येक ग्रह बीज-मन्त्र से आवाहित होकर अपने धान्य-पुंज पर विराजमान होता है। तदनन्तर षोडशोपचार-अर्चना — रंग-विशेष पुष्प सहित: सूर्य-लाल, चन्द्र-श्वेत, मंगल-लाल, बुध-हरा, गुरु-पीत, शुक्र-श्वेत-सुगन्धित, शनि-नील-कृष्ण, राहु-धूम्र, केतु-चित्र-पुष्प। फिर मुख्य जप: पुजारी (अथवा यजमान निर्देशन में) प्रत्येक ग्रह के बीज-मन्त्र का शास्त्रोक्त जप करता है — पाराशर-संख्या सूर्य 7,000, चन्द्र 11,000, मंगल 10,000, बुध 9,000, गुरु 19,000, शुक्र 16,000, शनि 23,000, राहु 18,000, केतु 17,000 (कुल 1,30,000) — कई बैठकों में विभाजित। समय-सीमा हो तो दशांश, शतांश अथवा सहस्रांश का जप किया जाता है, शेष नवग्रह-स्तोत्र पारायण से पूरा होता है। हवन: प्रत्येक ग्रह को 108 आहुतियाँ — सूर्य के लिए अर्क-काष्ठ, चन्द्र के लिए पलाश, मंगल के लिए खैर, बुध के लिए अपामार्ग, गुरु के लिए पीपल, शुक्र के लिए गूलर, शनि के लिए शमी, राहु के लिए दूर्वा, केतु के लिए कुश। समापन पूर्णाहुति, क्षमा-प्रार्थना, मंगल-आरती, दीपाराधन, ग्रह-दान (सूर्य-लाल वस्त्र-स्वर्ण, चन्द्र-श्वेत वस्त्र-मुक्ता, ... शनि-काला वस्त्र-लोह) और प्रसाद-वितरण से।
लाभ
लाभ ग्रह-वार वर्गीकृत हैं। सूर्य-जप: ओज, हृदय और नेत्र-स्वास्थ्य, पिता-सम्बन्धी कष्ट-निवारण, सत्ता-कृपा, आत्म-विश्वास। चन्द्र-जप: मानसिक शान्ति, अनिद्रा-निवारण, माता का स्वास्थ्य, स्त्रियों का मासिक और भावनात्मक सन्तुलन, चिर-अवसाद की समाप्ति। मंगल-जप: साहस, मांगलिक-दोष से विवाह-बाधा निवारण, भ्राता-पड़ोसी से विवाद-शमन, शल्य-चिकित्सा के बाद शीघ्र स्वस्थता, मुकदमे और प्रतियोगिता में विजय। बुध-जप: बुद्धि-तीक्ष्णता, परीक्षा-सफलता, हकलाहट और सीखने की कठिनाइयाँ दूर, व्यापार-वृद्धि, संचार-कौशल, त्वचा-रोग और स्नायु-तन्त्र की चिकित्सा। गुरु-जप: ज्ञान, सन्तान-प्राप्ति (सन्तानहीन दम्पतियों के लिए), कन्याओं के विवाह-विलम्ब का निवारण, विधिक-वाद में सफलता, आध्यात्मिक उन्नति, यकृत-स्थूलता-व्याधियों से रक्षा। शुक्र-जप: दाम्पत्य-सामंजस्य, वाहन-आभूषण-कलात्मक-उपहार, प्रजनन-मूत्र-स्वास्थ्य, परिष्कार और समृद्धि। शनि-जप: साढ़े-साती-ढैया की कठोरता का शमन, आयुष्य-वृद्धि, चिर-रोग और बेरोजगारी का निवारण, अनुशासन-धैर्य, दीर्घकालिक सफलता, कर्म-ऋणों का क्षय। राहु-जप: विदेश-यात्रा-वीसा-बाधा-निवारण, अकारण भय और आसक्ति का शमन, काल-सर्प दोष का भंजन, तकनीक और अपरम्परागत व्यवसाय में सफलता, विष-व्यसन से रक्षा। केतु-जप: मोक्ष-प्रेरणा, भ्रम और आत्म-विनाश का शमन, गूढ़ और शल्य-व्यवसाय में सफलता, पितृ-दोष का निवारण, आकस्मिक दुर्घटनाओं से रक्षा। ग्रह-विशेष फलों के अतिरिक्त, समग्र नवग्रह-जप कुण्डली का सम्पूर्ण सन्तुलन पुनः स्थापित करता है — अशुभ दशा को सहनीय शिक्षा में और शुभ दशा को पूर्ण विकास में बदल देता है।
सामग्री सूची
नवग्रह-मण्डल हेतु काष्ठ-पट्ट, चावल-आटा और नौ रंगीन चूर्ण। नौ कलश (छोटे ब्रास पात्र) — जल, आम-पत्ते, नारियल सहित — ग्रह-वर्ण के वस्त्र से लिपटे: सूर्य-लाल, चन्द्र-श्वेत, मंगल-लाल, बुध-हरा, गुरु-पीत, शुक्र-श्वेत, शनि-काला/नीला, राहु-धूम्र, केतु-बहुरंगी। नवधान्य: सूर्य-गेहूँ, चन्द्र-कच्चे चावल, मंगल-अरहर-दाल, बुध-मूँग, गुरु-चना-दाल, शुक्र-श्वेत चावल/राजमा, शनि-काले तिल, राहु-उड़द, केतु-कुलथी — प्रत्येक अलग पात्र में। नौ ग्रह-वर्ण पुष्प: सूर्य-लाल कमल और अर्क; चन्द्र-चमेली और श्वेत कमल; मंगल-लाल कनक-चम्पा; बुध-दूर्वा और हरे पत्ते; गुरु-चम्पा और पीत गेंदा; शुक्र-श्वेत चमेली और गुलाब; शनि-नीलोत्पल, शमी-पत्र और कृष्ण-पुष्प; राहु-तगर और श्याम-पुष्प; केतु-बहुरंगी जंगली पुष्प और दर्भा। नौ समिधाएँ: अर्क, पलाश, खैर, अपामार्ग, पीपल, गूलर, शमी, दूर्वा, कुश। यथासम्भव नवरत्न — माणिक्य (सूर्य), मुक्ता (चन्द्र), मूँगा (मंगल), पन्ना (बुध), पुखराज (गुरु), हीरा (शुक्र), नीलम (शनि), गोमेद (राहु), लहसुनिया (केतु)। नौ ग्रह-वर्ण वस्त्र, पञ्चामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर), नौ नैवेद्य (सूर्य-गुड़-चावल, चन्द्र-खीर, मंगल-गुड़-चावल, बुध-हरा-मूँग-पायस, गुरु-चना-पायस, शुक्र-श्वेत-खीर, शनि-तिल-चावल, राहु-उड़द-वड़ा, केतु-कुलथी-प्रसाद), हल्दी, कुङ्कुम, अक्षत, नौ घृत-दीप, कर्पूर, अगर-बत्ती, पान-सुपारी, पुजारी हेतु दक्षिणा-लिफ़ाफ़े, और ब्राह्मणों को वितरण हेतु ग्रह-दान-वस्तुएँ।
मंत्र और पाठ
बीज-मन्त्र — बृहत् पाराशर होरा शास्त्र और मन्त्र-महार्णव में संहिताबद्ध: सूर्य — ॐ ह्राँ ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः; चन्द्र — ॐ श्राँ श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः; मंगल — ॐ क्राँ क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः; बुध — ॐ ब्राँ ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः; गुरु — ॐ ग्राँ ग्रीं ग्रौं सः बृहस्पतये नमः; शुक्र — ॐ द्राँ द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः; शनि — ॐ प्राँ प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः; राहु — ॐ भ्राँ भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः; केतु — ॐ स्राँ स्रीं स्रौं सः केतवे नमः। प्रत्येक बीज शास्त्रोक्त संख्या में जपा जाता है (सूर्य 7,000 से केतु 17,000 तक, कुल 1,30,000)। पौराणिक स्तोत्र: व्यास-रचित नवग्रह स्तोत्रम् 'जपाकुसुमसङ्काशं काश्यपेयं महाद्युतिम् — तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम्', नवग्रह-मङ्गलाष्टक, सूर्य के लिए वाल्मीकि रामायण के युद्ध-काण्ड का आदित्य-हृदयम्, चन्द्र के लिए चन्द्र-स्तोत्रम् और सोम-कवचम्, स्कन्द पुराण का मंगल-स्तोत्र, बुध-पञ्चविंशतिका, गुरु बृहस्पति कवचम्, शुक्र कवचम्, शनि वज्र-पञ्जर स्तोत्र और दशरथ-कृत शनि स्तोत्र, राहु कवचम्, केतु कवचम्। समापन पर 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' शान्ति-मन्त्र। श्री-वैष्णव सन्निधियों में नवग्रह-पूजा भगवान् नारायण के अधीन की जाती है — ग्रह उनके परिवार के रूप में पूजे जाते हैं, और बीज-मन्त्रों से पूर्व तिरुप्पावै अथवा चयनित पाशुर पाठ किए जाते हैं।
क्षेत्रीय परंपराएँ
पूजा का विस्तृत स्पेक्ट्रम है। सरलतम रूप मन्दिर के नवग्रह-सन्निधि पर नवग्रह-प्रदक्षिणा है — भक्त नौ देवताओं की नौ बार परिक्रमा करता है, ग्रह-वर्ण के तेल-दीप अर्पित करता है, और सम्बन्धित स्तोत्र का पाठ करता है; यह सूर्य के लिए सूर्यनार कोयिल, शनि के लिए तिरुनल्लार, मंगल के लिए वैद्येश्वरन कोयिल, बुध के लिए तिरुवेंकाडु, गुरु के लिए अलंगुडी, शुक्र के लिए कान्जनूर, चन्द्र के लिए तिङ्गलूर, राहु के लिए तिरुनागेश्वरम् और केतु के लिए केज़पेरुम्पल्लम् — तमिलनाडु के नौ नवग्रह-स्थलों में प्रचलित विधि है। अधिक विस्तृत रूप गृह-नवग्रह-जप है, जिसमें पुजारी पूर्ण मण्डल-प्रतिष्ठा, कलश-स्थापना, संक्षिप्त जप-संख्या और समापन-आरती करता है। पूर्णतम रूप नवग्रह महा-होम है — एक से नौ दिनों में अनेक पुजारियों द्वारा 1,30,000 मन्त्रों का जप, अनुपात-आहुतियों सहित। एकल-ग्रह विशेष सामान्य हैं: साढ़े-साती और शनि-महादशा हेतु शनि-शान्ति-पूजा; मांगलिक-दोष-पीड़ित कुण्डलियों हेतु मंगल-शान्ति या कुज-दोष-निवारण; काल-सर्प दोष हेतु राहु-केतु शान्ति; विलम्बित विवाह या सन्तान हेतु गुरु-शान्ति; दैनिक निवारक अभ्यास के रूप में सूर्य-नमस्कार। तान्त्रिक सम्प्रदाय (विशेषतः शाक्त-आगम) ताम्र-पत्रों पर अंकित बीज-यन्त्रों से पूजा करते हैं। श्री-वैष्णव सम्प्रदाय में नवग्रह-अर्चना पाञ्चरात्र भगवद्-आराधन में अन्तर्भूत है — ग्रह स्वतन्त्र शक्तियाँ नहीं, अपितु श्रीमन्नारायण के सेवक रूप में पूजे जाते हैं; भगवान् को शरणागति विस्तृत ग्रह-शान्ति की आवश्यकता को न्यून कर देती है, तथापि बाह्य लोक-आचार के रूप में पूजा की ही जाती है। स्मार्त घर पाराशर-विधि और पूर्ण वैदिक-मन्त्रों को प्राथमिकता देते हैं।
मूल्य को क्या प्रभावित करता है?
शुल्क इन कारकों पर निर्भर है: (क) विस्तार — एकल-ग्रह शान्ति (शनि-शान्ति, राहु-शान्ति) रु.3,000-7,500, पूर्ण नौ-ग्रह नवग्रह-जप रु.8,000-25,000, और 1,30,000 आहुति वाला नवग्रह महा-होम रु.50,000-1,50,000+; (ख) जप-संख्या — संक्षिप्त 108 प्रति ग्रह बनाम 1,008 प्रति ग्रह बनाम पूर्ण पाराशर-शास्त्र संख्या, अवधि और दक्षिणा पर अनुपातिक प्रभाव; (ग) पुजारी-संख्या — गृह-संक्षिप्त-अनुष्ठान हेतु एकल पण्डित बनाम ग्रह-वार समानान्तर जप हेतु नौ का दल बनाम महा-होम हेतु तीन पुजारी प्रति ग्रह सहित सत्ताईस का दल; (घ) अवधि — अर्ध-दिन, पूर्ण-दिन, त्रि-दिन, नव-दिन अनुष्ठान; (ङ) सामग्री-विस्तार — स्थानापन्न समिधाओं सहित मूल कलश-सेट बनाम प्रामाणिक काष्ठ, धान्य और रत्नों सहित पूर्ण नौ-गुना सामग्री (अकेले रत्न, छोटे टुकड़े भी रु.5,000-30,000); (च) हवन-समावेश — केवल जप बनाम जप-सहित-हवन; (छ) स्थान — यजमान-गृह बनाम नवग्रह क्षेत्र (सूर्यनार कोयिल/तिरुनल्लार/वैद्येश्वरन कोयिल) जहाँ पुजारी मन्दिर-अर्चक-सम्मान से सेवा करता है; (ज) ज्योतिष-परामर्श — कुण्डली-पूर्व-विश्लेषण कि कौन-सा ग्रह प्राथमिक है; (झ) ग्रह-दान — पूजा-उपरान्त निर्धारित दान (सूर्य-लाल वस्त्र-स्वर्ण, चन्द्र-श्वेत वस्त्र-मुक्ता, ... शनि-काला वस्त्र-लोह), विस्तार के अनुसार रु.2,500-25,000; (ञ) ब्राह्मण-भोजन — होम के पश्चात् नौ, सत्ताईस अथवा एक-सौ-आठ ब्राह्मणों को भोजन; (ट) यात्रा — नगर-सीमा से बाहर पुजारी-यात्रा; (ठ) मुहूर्त-विस्तार — होरा-मुहूर्त की प्रतीक्षा (जो अनुष्ठान को एक बैठक से अधिक विस्तृत कर सकती है)।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नवग्रह जप (नौ ग्रहों की उपासना और शान्ति) हैदराबाद में में कितना समय लगता है?
पूरी पूजा आमतौर पर 1.5 से 3 घंटे लेती है — विस्तृत या संक्षिप्त विधि के अनुसार। अनुष्ठान आचमन, प्राणायाम और संकल्प से प्रारम्भ होता है, जिसमें यजमान अपना नाम, गोत्र, जन्म-नक्षत्र, वर्तमान दशा-भुक्ति, सम्बन्धित ग्रह-दोष और इच्छित फल घोषित करता है।
क्या पंडित जी सामग्री लाते हैं?
आप दो विकल्प चुन सकते हैं — सामग्री खुद की व्यवस्था करें, या पंडित जी से थोड़ा अतिरिक्त शुल्क लेकर लाने को कहें। नवग्रह-मण्डल हेतु काष्ठ-पट्ट, चावल-आटा और नौ रंगीन चूर्ण।
puja4all.com पर नवग्रह जप (नौ ग्रहों की उपासना और शान्ति) का मूल्य कैसे तय होता है?
puja4all.com पर आप केवल ₹101 का फ्लैट प्लेटफॉर्म शुल्क देते हैं — पंडित को 100% फीस मिलती है। पंडित की फीस अवधि, सामग्री शामिल या नहीं, भाषा और दूरी पर निर्भर करती है। शुल्क इन कारकों पर निर्भर है: (क) विस्तार — एकल-ग्रह शान्ति (शनि-शान्ति, राहु-शान्ति) रु.3,000-7,500, पूर्ण नौ-ग्रह नवग्रह-जप रु.8,000-25,000, और 1,30,000 आहुति वाला नवग्रह महा-होम रु.50,000-1,50,000+; (ख) जप-संख्या — संक्षिप्त 108 प्रति…
क्या मैं तेलुगु, हिंदी या अंग्रेज़ी में पंडित बुक कर सकता हूँ?
हाँ। puja4all.com पर हर पंडित जी का प्रोफाइल यह बताता है कि वे किन भाषाओं में पूजा करते हैं — तेलुगु, हिंदी, अंग्रेज़ी, और कई पंडित तमिल, कन्नड़, मराठी और बंगाली में भी। बुकिंग के समय अपनी पसंदीदा भाषा चुनें।
हैदराबाद में नवग्रह जप (नौ ग्रहों की उपासना और शान्ति) कितनी जल्दी बुक हो सकती है?
हैदराबाद में अधिकांश पूजाओं के लिए उसी दिन की बुकिंग संभव है (पंडित की उपलब्धता पर निर्भर)। पसंदीदा मुहूर्त सुरक्षित करने के लिए कम-से-कम 24 घंटे पहले बुकिंग की सलाह दी जाती है। गृह प्रवेश और विवाह के लिए 7–14 दिन पहले बुकिंग करें।
नवग्रह जप (नौ ग्रहों की उपासना और शान्ति) हैदराबाद में बुक करने के लिए तैयार हैं?
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